Thursday, July 11, 2019

प्रोटीन से रीढ़ की हड्डी की मरम्मत करना आसान

प्रोटीन से रीढ़ की हड्डी की मरम्मत करना आसान


वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्रोटीन का पता लगाया है जो मनुष्य में रीढ़ की हड्डी की चोट से उबरने में अहम साबित हो सकता है और नष्ट हुए उतकों की मरम्मत की चिकित्सकीय पद्धति के लिए अहम हो सकता है। एक जेब्राफिश अपनी रीढ़ की हड्डी के टूटने के बाद उसकी स्वतः पूर्ण मरम्मत कर लेती है जबकि वही मनुष्यों के लिए जानलेवा चोट साबित हो सकती है और वे लकवाग्रस्त हो सकते हैं। अमरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिकों ने एक विशेष प्रोटीन का पता लगाया है जो मनुष्यों के उतकों की मरम्मत की प्रक्रिया में अहम साबित हो सकता है। ड्यूक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर केन्नेथ पोस ने कहा कि नष्ट हुए उतकों की मरम्मत के लिए आज सीमित मात्रा में सफल चिकित्सा पद्धतियां उपलब्ध हैं, ऐसे में हमें उनकी पुनः उत्पत्ति प्रोत्साहित करने को लेकर जेब्राफिश जैसे जीवों की ओर देखने की आवश्यकता है। जब जेब्राफिश की टूट चुकी रीढ़ की हड्डी की फिर से उत्पत्ति की प्रक्रिया शुरू होती है तो 8 सप्ताह में नए तंत्रिका उतक चोट से पैदा हुए फासले को भर देते हैं और जेब्राफिश गंभीर रूप से लकवाग्रस्त होने से बच जाती है। वैज्ञानिकों ने इस शानदार प्रक्रिया के लिए संभावित रूप से जिम्मेदार अणुओं को समझने के लिए उनकी उन सभी जीन का अध्ययन किया जिनकी गतिविधि रीढ़ की हड्डी की चोट के बाद अचानक बदली। इस प्रक्रिया में कनेक्टिंग टिशु ग्रोथ फेक्टर (सीटीजीएफ) अहम है। वैज्ञानिकों ने जब सीटीजीएफ को अनुवांशिक रूप से नष्ट करने की कोशिश की तो मछली उतक की फिर से उत्पत्ति नहीं कर पाई। मनुष्यों एवं जेब्राफिश में अधिकतर प्रोटीन कोडिंग जीन साझे हैं और सीटीजीएफ अपवाद नहीं है और जब वैज्ञानिकों ने मछली की चोट वाली जगह में सीटीजीएफ का मानवीय संस्करण जोड़ा तो इसने पुनः उत्पत्ति की प्रक्रिया को बढ़ाया और मछली चोट के 2 सप्ताह बाद बेहतर तैरने लगी। पोस के समूह में शोधार्थी मायस्सा मोकाल्लड ने कहा कि मछली लकवे की समस्या से उबरकर टैंक में तैरने लगी। इस प्रोटीन का प्रभाव विचित्र है।

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