Friday, July 19, 2019

तैयार कर सकेंगे स्वस्थ रक्त कोशिकाएं

तैयार कर सकेंगे स्वस्थ रक्त कोशिकाएं


वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि आने वाले दिनों में किसी भी मरीज के इलाज में खून की कमी नहीं होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि जल्द ही वे इलाज में बड़ी मात्रा में रक्त की आपूर्ति कर पाएंगे। वर्तमान में, जब लोगों को चिकित्सा कारणों से रक्त की आवश्यकता होती है, तो उन्हें रक्त की कमी के कारण बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। रक्त विकार और कई अन्य बीमारियों में लोगों को बड़ी मात्रा में रक्त बनाना पड़ता है। एक लंबे शोध के बाद, वैज्ञानिकों ने वयस्क कोशिकाओं को बुनियादी कोशिकाओं में बदलने में कामयाबी हासिल की है। ये स्टेम कोशिकाएं किसी भी प्रकार की रक्त कोशिकाओं को बनाने में सक्षम होंगी, पिछले 20 वर्षों से वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि क्या मानव रक्त में मूल कोशिकाएं कृत्रिम रूप से बनाई जा सकती हैं। स्टेम सेल शरीर में किसी भी प्रकार की कोशिकाएं बना सकते हैं। अब शोधकर्ताओं की एक टीम को विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं को मिलाने में सफलता मिली है। उनमें रक्त स्टेम कोशिकाएं भी शामिल हैं। जब इन कोशिकाओं को चूहे के शरीर में डाला गया, तो उन्होंने विभिन्न प्रकार के मानव रक्त कोशिकाओं का निर्माण किया। संयुक्त राज्य अमेरिका के बोस्टन चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में पोस्टडॉक्टोरल शोधकर्ता डॉ। योइची सुगिमुरा ने कहा कि इस शोध की मदद से हम रक्त के वंशानुगत रोगों से मरीजों की कोशिकाओं को ले सकते हैं, और संपादन की मदद से, वे कर सकते हैं। उनके विकार को ठीक करके स्वस्थ रक्त कोशिकाओं को तैयार करें। कर रहे हैं। साथ ही, इसके कारण रक्त कोशिकाओं की निर्बाध आपूर्ति भी संभव हो सकती है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रमुख और सुगिमुरा के साथी शोधकर्ता डॉ। जॉर्ज डेली ने कहा कि हम जल्द ही स्वस्थ और प्रामाणिक मानव रक्त तैयार करने में सक्षम हो सकते हैं। 20 साल की मेहनत के बाद हम इस काम तक पहुंचे हैं।

Tuesday, July 16, 2019

8 ग्रह वाले एक और सौरमंडल की खोज

8 ग्रह वाले एक और सौरमंडल की खोज


अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा को बड़ी सफलता मिली है। NASA के केपलर स्पेस टेलीस्कोप ने हमारे जितना बड़ा ही एक और सोलर सिस्टम ढूंढ निकाला है। यह स्टार सिस्टम पहले ही खोजा गया था, अब वहीं पर आठवें ग्रह की भी पहचान कर ली गई है। ऐसे में सूर्य या उस जैसे किसी स्टार की परिक्रमा करने के मामले में केप्लर-90 सिस्टम की तुलना हमारे सौरमंडल से की जा सकती है। खास बात यह है कि इस खोज में गूगल की ओर से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद ली गई, जो इंसानों के रहने योग्य ग्रहों की तलाश करने में काफी मदद करेगा। केप्लर-90 सोलर सिस्टम की आठवें ग्रह का नाम केपलर-90i हैं। गूगल और नासा के इस प्रोजेक्ट द्वारा हमारे जैसे ही सौरमंडल की खोज से इस बात की उम्मीद बढ़ी है कि ब्रह्मांड में किसी ग्रह पर एलियन मौजूद हो सकते हैं। दिलचस्प है कि केपलर-90 के ग्रहों की व्यवस्था हमारे सौरमंडल जैसी ही है। इसमें भी छोटे ग्रह अपने स्टार से नजदीक है और बड़े ग्रह उससे काफी दूर मौजूद है। NASA के अनुसार, इस खोज से पहली बार स्पष्ट होता है कि दूर कहीं स्टार सिस्टम में हमारे जैसे ही परिवार मौजूद हो सकते हैं। यह सौरमंडल हमसे करीब 2,545 प्रकाश वर्ष दूर है। खगोल विज्ञानी एंड्रयू वांडबर्ग ने कहा कि, 'नया ग्रह पृथ्वी से करीब 30 फ़ीसदी बड़ा माना जा रहा है। हालांकि यह ऐसी जगह नहीं है, जहां आप जाना चाहेंगे।' उन्होंने बताया कि यहां काफी चट्टाने है और वातावरण भी घना नहीं है। सतह का तापमान काफी ज्यादा है और इससे लोग झुलस सकते हैं। वांडबर्ग के मुताबिक सतह का औसत तापमान करीब 800 डिग्री फारनहाइट हो सकता है।

अर्ध-प्रकाशगति से घूर्णन है करता ब्लैक होल

अर्ध-प्रकाशगति से घूर्णन है करता ब्लैक होल


श्याम विवर(black hole) इस ब्रह्मांड की सबसे विचित्र संरचनाओं मे से एक है। वे ब्रह्माण्ड के ऐसे निरंकुश दानव है जो अपने आसपास फटकने वाले चंद्रमा, ग्रह, तारे और समूचे सौर मंडलो को निगल जाते है। इनकी पकड़ से प्रकाश भी नही बच पाता है। श्याम विवर ब्रह्माण्ड के सफाई कर्मी तो है ही लेकिन वे बहुत ही तेज, अत्यंत तेज होते है। खगोल वैज्ञानिको ने एक ऐसा श्याम विवर खोज निकाला है जो प्रकाशगति से आधी गति से घूर्णन कर रहा है। प्रकाशगति से आधी गति ? जीहाँ आपने सही पढ़ा है, प्रकाशगति की आधी गति, 149,896 किमी/सेकंड की गति से घूर्णन! यह विचित्र श्याम विवर एक क्वासर RX J1131-1231 के केंद्र मे स्थित है और पृथ्वी से 6 अरब प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। वर्तमान मे वह पृथ्वी से दूर जा रहा है। यह एक उपलब्धि है कि वैज्ञानिक 6 अरब वर्ष दूरी पर स्थित श्याम विवर के घूर्णन की गणना करने मे सफल हुये है। संयोग से इस श्यामविवर की घूर्णन की गति की गणना करने के लिये आकंड़ो को जमा करने मे एक महाकाय दिर्घवृत्ताकार(elliptical ) आकाशगंगा का सहयोग मिला जो इस श्यामविवर और हमारी पृथ्वी के मध्य स्थित है। यह आकाशगंगा इस श्याम विवर द्वारा उतसर्जित प्रकाश को वक्र कर (मोड़) देती है, इस प्रक्रिया को गुरुत्विय लेंसींग कहा जाता है।  प्रकाशकिरणो मे आयी यह वक्रता दूरस्थ श्याम विवर की प्रकाश किरणो को केंद्रित कर देती है जिससे उनके मापन मे सहायता मीलती है। हम जानते है कि श्याम विवर केवल अवशोषण करता है, वह हमे दिखायी नही देता है। इसलिये श्यामविवर से उत्सर्जित प्रकाश किरणे वास्तविकता मे उस श्याम विवर के चारो ओर स्थित धूल और गैस के वलय (अक्रिशन डिस्क) से उत्सर्जित X किरणे ही होती है। इस अक्रिशन डिस्क उत्सर्जित X किरणो से श्याम विवर के आसपास एक लाखों डीग्री तापमान का बादल सा बनता है जिसे आभामंडल(कोरोना) कहते है। इस बादल की श्याम विवर से दूरी श्याम विवर की घूर्णन गति पर निर्भर है, जितनी अधिक घूर्णन गति उतनी कम दूरी। वैज्ञानिको ने अध्ययन के दौरान पाया कि RX J1131-1231 के आसपास स्थित बादल से आती हुयी X किरणे श्याम विवर के इतने समीप के क्षेत्र से आ रही है कि उसे उत्पन्न करने लिये श्याम विवर को अत्यंत तेज गति से घूर्णन करना चाहीये। अन्यथा यह अत्यंत उष्ण बादल श्यामविवर से इतनी कम दूरी पर बच नही सकता।

Monday, July 15, 2019

कॉफी पीने से धमनियों पर बुरा असर नहीं

कॉफी पीने से धमनियों पर बुरा असर नहीं


कॉफी पीना, खासकर एक दिन में 25 कप तक, धमनियों के लिए उतना भी बुरा नहीं है जितना पूर्व के अध्ययनों में माना गया है। सोमवार को सामने आए एक नये अध्ययन में ऐसा कहा गया है। धमनियां हमारे ह्रदय से ऑक्सीजन एवं पोषक तत्वों से युक्त रक्त को हमारे पूरे शरीर तक पहुंचाती हैं। अगर इनका लचीलापन खत्म होता है और ये सख्त हो जाती हैं तो ह्रदय पर जोर पड़ता है तथा व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ने या आघात का खतरा बढ़ जाता है। ब्रिटेन के क्वीन मैरी लंदन विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं के इस अध्ययन में 8,000 लोगों को शामिल किया गया था। यह अध्ययन पूर्व के अध्ययनों को गलत बताता है जिनमें दावा किया गया था कि कॉफी पीने से धमनियों में सख्ती आ जाती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि कॉफी पीने को धमनियों की सख्ती से जोड़ने वाले पूर्व अध्ययन परस्पर विरोधी थे और प्रतिभागियों की कम संख्या होने की वजह से इनको सर्वमान्य नहीं माना जा सकता। अध्ययन के लिए कॉफी की खपत को तीन श्रेणियों में बांटा गया था। पहला जो एक दिन में एक कप से कम कॉफी पीते हैं, दूसरा जो प्रतिदिन एक से तीन कप और तीसरा जो तीन कप से ज्यादा कॉफी पीते हैं। एक दिन में 25 कप से ज्यादा कॉफी पीने वाले लोगों को अध्ययन से बाहर रखा गया लेकिन इस उच्च सीमा तक भी कॉफी पीने वाले लोगों की तुलना जब एक कप से कम कॉफी पीने वालों से की गई तो उनकी धमनियों में सख्ती बढ़ जाना जैसा कुछ नहीं देखा गया।

Sunday, July 14, 2019

काम-काज की क्षमता को बेहतर बना सकता है खराब मूड

काम-काज की क्षमता को बेहतर बना सकता है खराब मूड


मानव मस्तिष्क को समझना आसान नहीं है। क्योंकि आमतौर पर माना जाता है कि खराब मूड में काम करने पर काम और खराब हो जाता है लेकिन हाल में एक रिसर्च हुआ जिसमें यह पता चला कि खराब मूड में काम करने की क्षमता और बेहतर हो जाती है। खराब मूड कुछ लोगों के काम-काज करने की क्षमता को बेहतर बना सकता है जिसमें ध्यान केंद्रित करने, वक्त प्रबंधन और कामों की प्राथमिकता तय करने आदि शामिल आदि क्षमताएं शामिल हैं। 'पर्सनैलिटी ऐंड इंडिविजुअल डिफरेंसेज' में प्रकाशित शोध में यह भी पाया गया कि कुछ मामलों में काम-काज करने पर अच्छे मूड का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कनाडा की वॉटरलू यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि क्या हमारी भावनात्मक प्रतिक्रियाएं यह तय करती हैं कि किस तरह हमारा मूड सोचने समझने के कौशल को प्रभावित करता है। शोध में 95 प्रतिभागी शामिल हुए। सभी ने 9 अलग-अलग काम कीए और प्रश्नावली पूरी की। इनके आधार पर मूड, भावनात्मक प्रतिक्रिया और विभिन्न कामकाजी स्मरण शक्ति और विश्लेषणात्मक चुनौतियों की परस्पर क्रिया का आकलन किया गया। वाॅटरलू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर तारा मैकाआॅले ने कहा कि हमारे परिणामों में पता चला कि कुछ लोगों के लिए खराब मूड दरअसल उनकी सोचने समझने की क्षमता को धार देने का काम करता है, ऐसी क्षमताएं जो प्रतिदिन के जीवन के लिए महत्वपूर्ण है।

Saturday, July 13, 2019

10 गुना तेज होगा वाई-फाई इंटरनेट

10 गुना तेज होगा वाई-फाई इंटरनेट


वाय-फाय इंटरनेट की अब एक ऐसी तकनीक आ रही है जो एलईडी बल्ब पर की रोशनी पर आधारित है। यह तकनीक वाय-फाय की अभी वाली तकनीक से 10 गुना ज्यादा तेज गति से इंटरनेट मुहैया कराती है। इस तकनीक को आॅरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर इजाद किया है। वाय-फाय की यह एक WiFo नाम से आई ऐसी तकनीक है जो इंटरनेट को एलईडी बल्ब की रोशनी से यूजर के सिस्टम तक पहुंचाती है। रोशनी पर आधारित यह तकनीक फ्री स्पेस सिस्टम पर काम करती है। जिस किसी यूजर को अपने मोबाइल फोन, टैबलेट अथवा कंप्यूटर/लैपटॉप पर इस तकनीक के जरिए वाय-फाय इंटरनेट चलाना होता है उसे एलईडी बल्ब की रोशनी के संपर्क में रहना होता है। एलईडी बल्ब की रोशनी से वाय-फाय इंटरनेट मुहैया कराने वाली वायफो तकनीक के कई फायदे हैं। एक तो वाय-फाय इंटरनेट पहुंचाने के लिए काम में आने वाले उपकरणों का खर्चा बचेगा। दूसरा यह है कि यह अभी मिल रहे वाय-फाय सिस्टम से 10 गुना तेज गति से इंटरनेट आता है। WiFo इंटरनेट तकनीक इजाद करने वाले ऑरेगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं में शामिल एसोसिएट प्रोफेसर थिन नगुयेन का कहना है इसके लिए पेटेंट हासिल किया जा चुका है। अब यह तकनीक जल्दी स्मार्टफोन्स टेबलेट्स और कंप्यूटर/लैपटॉप आदि में मुहैया कराई जाएगी।

Friday, July 12, 2019

सहचारी शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम होते हैं पौधे

सहचारी शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम होते हैं पौधे


पौधे भी विभिन्न घटनाओं के बीच के तार जोड़कर अपने पर्यावरण के बारे में चीजें सीख सकते हैं। अब तक माना जाता था कि यह क्षमता सिर्फ प्राणियों में ही होती है, लेकिन एक नए अध्ययन में पहली बार पौधों के इस खास गुण के बारे में बताया गया है। यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में यह साबित किया गया है कि पौधे सहचारी शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम हैं। शोधकर्ता पावलोव द्वारा कुत्तों पर किए गए प्रयोगों से प्रेरित थे। पावलोव का अध्ययन व्यवहार संबंधी शोधों के इतिहास में सबसे प्रमुख अध्ययनों में से एक है। इस अध्ययन ने दिखाया था कि अनुकूलन का इस्तेमाल करते हुए व्यवहार में बदलाव लाया जा सकता है। व्यवहार संबंधी विभिन्न प्रयोगों के बाद दल ने इस बात के साक्ष्य पेश किए कि पौधे किसी एक घटना के घटने और अन्य के पूर्वानुमान के बीच के खास जुड़ाव को समझ सकने में सक्षम हैं। विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एवोल्यूशनरी बायोलॉजी की प्रोफेसर मोनिका गैगलियानो ने मटर के पौधों के साथ प्रयोग किए। उन्होंने इन पौधों को वाई-आकार के एक ढांचे में रख दिया। इसमें यह देखना था कि किसी दिशा विशेष से प्रकाश आने पर पौधे कैसा व्यवहार करते हैं। परिणामों में पाया गया कि पौधे एक बार प्रकाश के हटाए जाने पर अपनी वृद्धि के लिए सबसे सही दिशा चुनना सीख गए थे। यह अध्ययन साइंटिफिक रिपोर्ट्स नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया।