80 साल के अंदर जानलेवा हो जाएगी दुनिया
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण इंसान के भविष्य पर दिनोदिन और गहरे सवाल खड़े होते जा रहे हैं। विश्व की तीन चौथाई आबादी को जल्द ही भयानक लू के थपेड़ों का सामना करना पड़ सकता है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर इतनी बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रहता है, तो हम में से कई लोगों को अपने जीते-जी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। 1980 से लेकर अब तक दुनिया के 1,900 अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग गर्मी और उसम के कारण मारे गए हैं। 2010 में मॉस्को के अंदर 10,800 लोगों की गर्मी के कारण मौत हुई। 2003 में पैरिस में करीब 4,900 लोग गर्मी और उसम के कारण मारे गए। 1995 में शिकागो के अंदर गर्मी और उसम ने लगभग 740 लोगों की जान ली। शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु इतनी तेजी से बदल रही है कि इतने कम समय में बढ़े हुए तापमान के प्रति इंसानों की प्रतिरोधक क्षमता बेहतर नहीं हो सकती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, साल 2000 में दुनियाभर में बड़ी तादाद में लोग 20 दिन या इससे भी ज्यादा समय तक गर्मी के कारण बेहद जानलेवा स्थिति के शिकार हुए। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कार्बन उत्सर्जन इसी तरह होता रहा, तो इस सदी के अंत तक विश्व के 74 फीसदी लोगों को बढे हुए तापमान के कारण बेहद गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ेगा। सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बातें तो यह है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाने की हरसंभव कोशिश करने पर भी दुनिया की 47 फीसदी से ज्यादा आबादी 2100 तक घातक व जानलेवा लू का शिकार हो जाएगी। एक शोध में पाया गया कि प्राकृतिक कारणों के मुकाबले इंसानों की गतिविधियां इस दुनिया को 170 गुना तेजी से गर्म कर रही है। इस बढ़ती गर्मी के कारण पेड़-पौधों और जीवों की कई प्रजातियों को बहुत गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। नेचर क्लाइमेट चेंज नाम की एक पत्रिका में छपे एक शोधपत्र का कहना है कि इस जलवायु परिवर्तन के कारण इंसानों के अस्तित्व पर खतरा गहराने लगा है।
No comments:
Post a Comment